Berojgari Ki Samasya In Hindi Essays

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भारत में बेरोजगारी

Bharat me Berojgari

अथवा

बेरोजगारी की समस्या 

Berojgari ki Samasya

निबंध नंबर :-01

समस्याओ के देश भारतवर्ष में जो एक बहुत बड़ी समस्या सभी को पीड़ित व आतंकित किए हुए है, वह है बेकारी की समस्या | भारत में यह समस्या द्वितीय महायुद्ध के समाप्त होते – होते बढने लगी थी और आज यह अपनी चरम सीमा पर विद्दमान है | तथा यह धीरे-धीरे विकराल रूप धारण करती जा रही है | आज देश में शिक्षित बेरोजगारो की संख्या लगभग दस करोड़ है जिसमे लाखो युवक पथ-भ्रष्टता एव अराजकता के शिकार बन गये है | आज जो देश में हिसा, तोड़ – फोड़ , मारधाड़ , धोखाधड़ी आदि कई तरह के आपराध पनप  रहे है उनका कारण है बेकार युवा वर्ग की मानसिकता | कहावत भी है खाली मन – मस्तिष्क शैतान का घर |

हमारे देश में बेकार अंग्रेजो की देन है | अंग्रेजी ने देश के उन छोटे-छोटे उद्दोगो को समाप्त कर दिया जिन्हें प्राचीन काल से भारतीय अपने घरो में चलाकर रोजीरोटी कमा लेते थे | कोई कपड़ा बुनता, कोई चरखा कातता , कोई गुड बनाता तो कोई टोकरी व खिलौने | यह सब उन्होंने अपने देश के व्यापार को बढ़ाने के लिए किया |

बेकारी की समस्या का दूसरा मूल कारण है भारत की बढती जनसंख्या | देश के साधन तथा उत्पादन तो आगे बढ़ते नही वरन उपभोक्तओ की संख्या निरन्तर बढती गई | अंत : प्रत्येक घर में दरिद्रता बढती चली गई | अर्थात परिवार में कमाने वालो की संख्या सीमित होती चली गई |

इसका तीसरा कारण है वर्तमान शिक्षा पद्धति , जो देश में केवल क्लर्को की संख्या को बढ़ाने में सहायक रही | चौथा कारण है सामजिक व धार्मिक परम्पराओ का होना | साधु-सन्यासियों को भिक्षा देने व दान देने के प्रवृत्ति ने भी लोगो को आलसी बना दिया है | ह्रष्ट-पुष्ट शरीर वाले लोग भी भिक्षावृति पर उत्तर आटे है | वर्णव्यवस्था के कारण भी बेरोजागारी को बढ़ावा मिला है | किसी एक वर्ग का व्यक्ति दुसरे के कार्य को नही अपनाना चाहता , भले ही उसे बेकार ही क्यों ने रहना पड़े |

बेरोजागारी के कारण युवको में फैले आक्रोश तथा असन्तोष ने समाज में अव्यवस्था व अराजकता की स्थिति पैदा कर दी है | यदि इसका शीघ्र ही कोई हल नही ढूंढा गया तो इसके भयंकर परिणाम होने की सम्भावना है आज इस बढ़ते हुए बेकारी के रोग को समूल उखाड़ फेकने के लिए हमे अनेक उपाय करने होगे | सर्वप्रथम तो जनसंख्या की वृद्धि को रोकना होगा | दूसरा हमे अपनी शिक्षा पद्धति में परिवर्तन करना होगा | वह तकनीकी व व्यावहारिक होनी चाहिए | तीसरा घरेलू व लघु उद्दोगो को बढ़ावा देना होगा | चौथा हमे अपनी धार्मिक मान्यताओं में परिवर्तन लाना होगा |

भारत की सरकार ने इस समस्या के हल के लिए काफी ठोस कदम उठाए है | जैसे (i) स्नातक बेरोजगारों को सस्ते डॉ पर रुपया उधार देना (ii) 20-सूत्री कार्यक्रम की स्थापना करना तथा (iii) बड़े-बड़े उद्दोगो की स्थापना करना आदि |

 

निबंध नंबर :-02

बेरोजगारी की समस्या

Berojgari ki Samasya

बेरोजगारी देश के सम्मुख एक प्रमुख समस्या है जो प्रगति के मार्ग को तेजी से अवरूद्ध करती है। यहाँ पर बेरोजगार युवक-युवतियों की संख्या दिन पर दिन बढ़ती जा रही है। स्वतंत्रता के पचास वर्षों बाद भी सभी को रोजगार देने के अपने लक्ष्य से हम मीलों दूर हैं। बेरोजगारी की बढ़ती समस्या निरंतर हमारी प्रगति, शांति और स्थिरता के लिए चुनौती बन रही है।

हमारे देश मंे बेरोजगारी के अनेक कारण हैं। अशिक्षित बेरोजगार के साथ शिक्षित बेरोजगारों की संख्या भी निरंतर बढ़ रही है। देश के 90ः किसान अपूर्ण या अद्ध बेरोजगार हैं जिनके लिए वर्ष भर कार्य नहीं होता है। वे केवल फसलों के समय ही व्यस्त रहते हैं। शेष समय में उनके करने के लिए खास कार्य नहीं होता है।

यदि हम बेरोजगारी के कारणों का अवलोकन करें तो हम पाएँगे कि इसका सबसे बड़ा कारण देश की निंरतर बढ़ती जनसंख्या है। हमारे संसाधनों की तुलना में जनसंख्या वृद्धि की गति कहीं अधिक है जिसके फलस्वरूप देश का संतुलन बिगड़ता जा रहा है। इसका दूसरा प्रमुख कारण हमारी शिक्षा-व्यवस्था है। वर्षोंे से हमारी शिक्षा पद्धति में कोई विशेष परिवर्तन नहीं हुआ है। हमारी वर्तमान शिक्षा पद्धति का आधार प्रायोगिक नहीं है। यही कारण है कि उच्च शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् भी हमें नौकरी नहीं मिल पाती है। बेरोजगारी का तीसरा प्रमुख कारण हमारे लघु उद्योगों का नष्ट होना अथवा उनकी महत्ता का कम होना है। इसके फलस्वरूप देश के लाखों लोग अपने पैतृक व्यवसाय से विमुख होकर रोजगार की तलाश मंे इधर-उधर भटक रहे हैं।

आज आवश्यकता इस बात की है कि बेरोजगारी के मूलभूत कारणों की खोज के पश्चात् इसके निदान हेतु कुछ सार्थक उपाय किए जाएँ। इसके लिए सर्वप्रथम हमें अपने छात्र-छात्राओं तथा युवक-युवतियांे की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा। यह तभी प्रभावी हो सकता है जब हम अपनी शिक्षा प्रदान करें जिससे वे शिक्षा का समुचित प्रयोग कर सके। विद्वालयों में तकनीकी एवं कार्य पर अधारित शिक्षा दें जिससे उनकी शिक्षा का प्रयोग उद्योगों व फैक्ट्रियों में हो सके और वे आसानी से नौकरी पा सकें।

इस दिशा मंे सरकार निरंतर कार्य कर रही है। अपनी पंचवर्षीय व अन्य योजनाओं के माध्यम से लघु उद्योग के विकास के लिए वह निरंतर प्रयासरत है। सभी सरकारी एंव गैर सरकारी विद्यालयोें मे तकनीकी तथा व्यावसायिक शिक्षा को प्रोत्साहन दिया जा रहा है। बढ़ती जनसंख्या को नियंत्रण में लेने हेतु विभिन्न परिवार कल्याण योजनाओं को लागू किया गया है। सभी बड़े शहरों मे रोजगार कार्यालय खोले गए हैं जिनके माध्यम से युवाओं को रोजगार की सुविधा प्रदान की जाती है। परंतु विभिन्न सरकारों ने यह सवीकार किया है कि रोजगार कार्यालयों के माध्यम से बहुत थोड़ी संख्या में ही बेराजगारों को खपाया जा सकता है क्योंकि सभी स्थानों पर जितने बेकार हैं उसकी तुलना मे रिक्तियांे की संख्या न्यून है। इस कारण बहुत से लोग अंसगठित क्षेत्र में अत्यंत कम पारिश्रमिक पर कार्य करने के लिए विविश हैं।

वर्तमान में सरकार इस बात पर अधिक बल दे रही है कि देश के सभी युवक स्वावलंबी बनें। वे केवल सरकारी सेवाओं पर ही आश्रित न रहें अपितु उपयुक्त तकनीकी अथवा व्यावसायिक शिक्षा ग्रहण कर स्वरोजगार हेतु प्रयास करें। नवयुवकों को उद्यम लगाने हेतु सरकार उन्हें कम ब्याज दरों पर ऋण प्रदान कर रही है तथा उन्हें उचित प्रशिक्षण देने में भी सहयोग कर रही है। हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि बदलते परिपेक्ष्य मंे हमारे देश के नवयुवक कसौटी पर खरे उतरेेंगे और देश में फैली बेरोजगारी जैसी समस्या से दूर रहने में सफल होंगे।

 

निबंध नंबर :- 03

बेरोजगारी: एक अभिशाप

Berojgari – Ek Abhishap

प्रस्तावना- हमारे देश में बेरोजगारी एक भंयकर समस्या है, जो दिन-प्रतिदिन त्रीव गति से बढ़ती जा रही है। आज के जमाने में पढ़े-लिखे लोगों में बेरोजगारी की समस्या अधिक है। वे अपने स्कूल एवं काॅलेजों से उच्च शिक्षा प्राप्त करके, शिक्षा पर लाखों रूपये खर्च करके अच्छी नौकरी पाने की उम्मीद रखते हैं। यह अधिकाशं नौजवानों का स्वभाव है। यह ब्रिटिश सरकार की देन है।

लेकिन, वर्तमान समय में रिश्वतखोरी- धांधलेबाजी के कारण उनकी अच्छे रोजगार पाने की अभिलाषा पूरी नहीं हो पाती जिससे वे बेरोजगार होकर सड़कों पर भटकते रहते हैं। इसके अलावा नौकरियों की संख्या कम है, पढ़े-लिखे बेरोजगार अधिक हैं, इसके कारण भी समस्या अभिशाप के रूप में फल-फूल रही है।

बेरोजगारी से परेशान होकर कुछ युवक अपराध की दुनिया में शामिल होते हैं तथा लूटपात-चोरी एवं डकैती डालकर अपनी जीविका चलाने का प्रयास करते हैं। जो आज के समय के लिए निहायत चिंताजनक बात है।

बेरोजगारी के कारण युवकों में फैले आक्रोश व असन्तोष ने समाज में हिंसा, तोड़-फोड़, मारधाड़ व अनेक तरह के अपराधों में वृद्वि हुई है। इस बारे में कहा जा सकता है- खाली दिमाग शैतान का घर। नौजवान यदि खाली है, बेरोजगार है तो उस पर शैतानी प्रवृतियां कब्जा जमाएंगी ही।

आज के नौजवानों को जब नौकरी नहीं मिलती तो वे हताशा एवं कुण्ठा का शिकार हो जाते हैं। यह एक स्वाभाविक प्रवृति है।

यदि किसी परिवार की आर्थिक स्थिति काफी खराब है और घर में पैसे की तंगी है, युवक को दौड़-धूप करने के बाद भी रोजगार प्राप्त नहीं होता तो ऐसी दशा में अधिकतर युवक आत्महत्या करने का प्रयास भी करते हैं। हताशा और कुण्ठा का परिणाम आत्महत्या के रूप में सामने आता है।

बेरोजगारी का अर्थ- बेरोजगारी का अर्थ ऐसी स्थिति से है, जब कोई इच्छुक व्यक्ति अपनी जीविका चलाने के लिए किसी आॅफिस, दुकान, फैक्ट्री, कारखाने तथा अन्य किसी स्थान पर मजदूरी की दरों पर कार्य मांगने जाता है और मालिक काम करवाने से मना कर देता है तो ऐसी दशा को बेरोजगारी कहते हैं। बेरोजगारी तब बढ़ती है जब मांग और पूर्ति का सन्तुलन बिगड़ जाता है। रोजगार मांगने वालों की संख्या दस है और पूर्ति होने की संख्या एक है। इस अवस्था में एक की पूर्ति होने पर नौ लाख बेरोजगार रह जायेंगे। ऐसे में श्रम का शोषण होगा तथा यदि सरकारी नौकरी का मामला हो तो रिश्वतखोरी, भ्रष्टाचार और सोर्स-सिफारिश को आज के समय बढ़ावा मिलेगा।

बेरोजगारी से उत्पन्न समस्या- बेरोजगारी किसी भी देश की आर्थिक, सामाजिक, दीवालियेपन का प्रतीक है। यह एक महत्वपूर्ण समस्या है, जो देश के कोने-कोने में अपने पांव पसारती है तथा आर्थि समस्या, भ्रष्टाचार और कुण्ठा को समाज व देश में जन्म देती है।

यह एक ऐसी भयानकपूर्ण समस्या है जिसके कारण मानव की मस्तिषक शक्ति तो क्षीण होती ही है, वरन् देश की उन्नति भी रूक जाती है।

बेरोजगारी के कारण

बेरोजगारी को बढ़ावा देने वाले प्रमुख कारण निम्न हैं-
(1) जनसंख्या में वृद्वि- देश में तीव्र गति से बढ़ रही जनसंख्या बेरोजगारी को बढ़ावा देने का प्रमुख कारण है। वर्तमान समय मंे हमारे देश की जनसंख्या सौ करोड़ से ऊपर है। हमारा देश जनसंख्या के हिसाब से विश्व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। इस प्रकार अधिक जनसंख्या होने से अन्न, आवास तथा शिक्षा पर गहरा प्रभाव पड़ता है जिसके कारण बेरोजगारी मे भी वृद्वि होती है।

(2) दोषपूर्ण शिक्षा नीति- बेरोजगारी का दूसरा प्रमुख कारण दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली है। वर्तमान शिक्षा, नौजवानों के मन में स्वावलम्बन या अपने धन्धे चलाने की प्रेरणा न देकर मात्र नौकर या सुविधा भोग की प्रेरणा देती है।

(3) कुटीर उधोगों की तरफ ध्यान न देना- वर्तमान समय में बड़े-बड़े या लघु उधोग तो निरन्तर खोले जा रहे हैं लेकिन छोटे कुटीर उधोगों की तरफ कोई ध्यान नही दिया जा रहा है। मशीनीकरण का उपयोग भी काफी बढ़ गया है, जिस कारण कुटीर उधोगों से जुड़ें लोग, सामान्य शिक्षा प्राप्त अनेक नवयुवक बेकार होते जा रहे है। जिस कारण बेरोजगारी मंे निरन्तर वृद्वि हो रही है।

(4) पंचवर्षीय योजनाओं की असफलता- पंचवर्षीय योजनाओं की असफलता भी बेरोजगारी बढ़ने का प्रमुख कारण है। यदपि स्वतन्त्रता के पश्चात् हमारे देश में पंचवर्षीय योजनाओं का तेजी से प्रयोग हुआ जिसके कारण अनेक बेरोजगारों को रोजगार की प्राप्ति हुई, लेकिन वर्तमान समय में पंचवर्षीय योजनाओं की असफलताओं से रोजगारी पर काफी प्रभाव पड़ा। ‘सबको शिक्षा, सबको काम‘ के सिद्वान्त पर कोई अमल न हो सका।

(5) कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी- देश में कुशल व प्रशिक्षित व्यक्तियों की कमी है। अच्छी मशीन, उपकरण, खराब हो जाये तो प्रशिक्षित कारीगर नहीं मिलते। उधोग को अधिक विकसित करना हो तो विदेशी व्यक्तियों की सहायता लेनी पड़ती है। हमें अनेक सुविधा साधन के उपकरणों को विदेशों से खरीदना पड़ता है, यदि वही उपकरण देश में बनने लगे तो उसके लिए कुशल प्रशिक्षित व्यक्ति चाहियें। जिनकी कमी है।

बेरोजगारी को रोकने के उपाय

(1) बेरोजगारी को रोकने के लिए सबसे पहले जनसंख्या वृद्वि पर नियंत्रण पाना आवश्यक है।
(2) देश की शिक्षा नीति में सुधार लाना होगा। शिक्षा को रोजगार परक बनाना एक अच्छा विकास है।
(3) ऐसे कुटीर उधांेगो का विकास करना होगा जहां अधिक से अधिक मजदूरों को काम पर लगाया जा सकें। इसके लिए लघु कुटीर उधोगों को सरकार द्वारा बढ़ावा दिया जाना चाहिये।
(4) पंचवर्षीय योजानाओं को सफल बनाने के लिए हर सम्भव प्रयास करने चाहिये। इसके लिए ‘सबको शिक्षा, सबको काम‘ लक्ष्य बनाकर उसे पूरा किया जाना चाहिये।
(5) देश में उपलब्ध कुशल एवं प्रशिक्षित व्यक्तियों को ढूंढकर उन्हें रोजगार देना होगा ताकि देश में उन्नत तकनीक विकसित हो तथा आने वाले समय में अधिकतर को काम मिल सकें।
(6) प्राकृतिक संसाधनों का समुचित उपयोग की ओर सरकार को अधिक ध्यान देना चाहिये।
(7) आर्थिक एवं सामाजिक ढांचे मंे परिर्वन करना चाहिये।

उपसंहार- इन उपरोक्त बिन्दुओं द्वारा ही हमारा देश बेरोजगारी जैसी भंयकर समस्या से छुटकारा पा सकता है। इस समस्या को दूर करके किसी भी देश का आर्थिक विकास किया जाना सम्भव है, अन्यथा देश को अपराध, कुण्ठा-हताशा और हताशा के कारण आत्महत्या की घटनायें बढ़ती चली जायेगी जो देश के लिए अभिशाप साबित होंगी।

February 5, 2017evirtualguru_ajaygourHindi (Sr. Secondary), LanguagesNo CommentHindi Essay, Hindi essays

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बेरोजगारी किसी भी देश के विकास में प्रमुख बाधाओं में से एक है। भारत में बेरोजगारी एक गंभीर मुद्दा है। शिक्षा का अभाव, रोजगार के अवसरों की कमी और प्रदर्शन संबंधी समस्याएं कुछ ऐसे कारक हैं जो बेरोज़गारी का कारण बनती हैं। इस समस्या को खत्म करने के लिए भारत सरकार को प्रभावी कदम उठाने की ज़रूरत है।

विकासशील देशों के सामने आने वाली मुख्य समस्याओं में से एक बेरोजगारी है। यह केवल देश के आर्थिक विकास में खड़ी प्रमुख बाधाओं में से ही एक नहीं बल्कि व्यक्तिगत और पूरे समाज पर भी एक साथ कई तरह के नकारात्मक प्रभाव डालती है। हमारे देश में बेरोजगारी के मुद्दे पर यहाँ विभिन्न लंबाई के कुछ निबंध उपलब्ध करवाए गये हैं।

बेरोजगारी पर निबंध (अनएम्प्लॉयमेंट एस्से)

Get here some essays on Unemployment in Hindi language for students in 200, 300, 400, 500, and 600 words.

बेरोजगारी पर निबंध 1 (200 शब्द)

जो लोग काम करना चाहते हैं और ईमानदारी से नौकरी की तलाश कर रहे हैं लेकिन किसी कारणवश उन्हें नौकरी नहीं मिल पा रही है उन्हें बेरोजगार कहा जाता है। इसमें उन लोगों को शामिल नहीं किया जाता है जो स्वेच्छा से बेरोजगार हैं और जो कुछ शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य समस्या के कारण नौकरी करने में असमर्थ हैं।

ऐसे कई कारक हैं जो देश में बेरोजगारी की समस्या का कारण बनते हैं। इसमें मुख्य है:

  • मंदा औद्योगिक विकास
  • जनसंख्या में तीव्र वृद्धि
  • सैद्धांतिक शिक्षा पर केंद्रित रहना
  • कुटीर उद्योग में गिरावट
  • कृषि मजदूरों के लिए वैकल्पिक रोजगार के अवसरों की कमी
  • तकनीकी उन्नति न होना

बेरोजगारी केवल व्यक्तियों को ही प्रभावित नहीं करती बल्कि देश के विकास की दर को भी प्रभावित करती है। इसका देश के सामाजिक और आर्थिक विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। बेरोजगारी के कुछ परिणाम यहां दिए गए हैं:

  • अपराध दर में वृद्धि
  • रहन-सहन का खराब मानक
  • कौशल और हुनर का नुकसान
  • राजनैतिक अस्थिरता
  • मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दे
  • धीमा आर्थिक विकास

हैरानी की बात यह है कि समाज में नकारात्मक नतीजों के बावजूद बेरोजगारी भारत में सबसे ज्यादा अनदेखी समस्याओं में से एक है। सरकार ने समस्या को नियंत्रित करने के लिए कुछ कदम उठाए हैं; हालांकि ये कदम पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। सरकार के लिए इस समस्या को नियंत्रित करने हेतु कार्यक्रमों को शुरू करना ही काफी नहीं है बल्कि उनकी प्रभावशीलता पर भी ध्यान देना ज़रूरी है और यदि आवश्यकता पड़े तो उन्हें संशोधित करने का कदम भी उठाना चाहिए।


 

बेरोजगारी पर निबंध 2 (300 शब्द)

बेरोजगारी समाज के लिए एक अभिशाप है। इससे न केवल व्यक्तियों पर बुरा प्रभाव पड़ता है बल्कि बेरोजगारी पूरे समाज को भी प्रभावित करती है। कई कारक हैं जो बेरोजगारी का कारण बनते हैं। यहां इन कारकों की विस्तार से व्याख्या की गई और इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए संभावित समाधान बताये गये हैं।

भारत में बेरोजगारी को बढ़ाने वाले कारक

  1. जनसंख्या में वृद्धि

देश की जनसंख्या में तेजी से होती वृद्धि बेरोजगारी के प्रमुख कारणों में से एक है।

  1. मंदा आर्थिक विकास

देश के धीमे आर्थिक विकास के परिणामस्वरूप लोगों को रोजगार के कम अवसर प्राप्त होते हैं जिससे बेरोजगारी बढ़ती है।

  1. मौसमी व्यवसाय

देश की आबादी का बड़ा हिस्सा कृषि क्षेत्र में जुड़ा हुआ है। मौसमी व्यवसाय होने के कारण यह केवल वर्ष के एक निश्चित समय के लिए काम का अवसर प्रदान करता है।

  1. औद्योगिक क्षेत्र की धीमी वृद्धि

देश में औद्योगिक क्षेत्र की वृद्धि बहुत धीमी है। इस प्रकार इस क्षेत्र में रोजगार के अवसर सीमित हैं।

  1. कुटीर उद्योग में गिरावट

कुटीर उद्योग में उत्पादन काफी गिर गया है और इस वजह से कई कारीगर बेरोजगार हो गये हैं।

बेरोजगारी खत्म करने के संभव समाधान

  1. जनसंख्या पर नियंत्रण

यह सही समय है जब भारत सरकार देश की आबादी को नियंत्रित करने के लिए कठोर कदम उठाए।

  1. शिक्षा व्यवस्था

भारत में शिक्षा प्रणाली कौशल विकास की बजाय सैद्धांतिक पहलुओं पर केंद्रित है। कुशल श्रमशक्ति उत्पन्न करने के लिए प्रणाली को सुधारना होगा।

  1. औद्योगिकीकरण

लोगों के लिए रोज़गार के अधिक अवसर बनाने के लिए सरकार को औद्योगिक क्षेत्र को बढ़ावा देने के लिए कदम उठाने चाहिए।

  1. विदेशी कंपनियां

सरकार को रोजगार की अधिक संभावनाएं पैदा करने के लिए विदेशी कंपनियों को अपनी इकाइयों को देश में खोलने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।

  1. रोजगार के अवसर

एक निश्चित समय में काम करके बाकि समय बेरोजगार रहने वाले लोगों के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा किए जाने चाहिए।

निष्कर्ष

देश में बेरोजगारी की समस्या लंबे समय से बनी हुई है। हालाँकि सरकार ने रोजगार सृजन के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं पर अभी तक वांछनीय प्रगति हासिल नहीं हो पाई है। नीति निर्माताओं और नागरिकों को अधिक नौकरियों के निर्माण के साथ ही रोजगार के लिए सही कौशल प्राप्त करने के लिए सामूहिक प्रयास करने चाहिए।


 

बेरोजगारी पर निबंध 3 (400 शब्द)

भारत में बेरोजगारी प्रच्छन्न बेरोजगारी, खुले बेरोजगारी, शिक्षित बेरोजगारी, चक्रीय बेरोजगारी, मौसमी बेरोजगारी, तकनीकी बेरोजगारी, संरचनात्मक बेरोजगारी, दीर्घकालिक बेरोजगारी, घर्षण बेरोज़गारी और आकस्मिक बेरोजगारी सहित कई श्रेणियों में विभाजित की जा सकती है। इन सभी प्रकार की बेरोजगारियों के बारे में विस्तार से पढ़ने से पहले हमें यह समझना होगा कि वास्तव में किसे बेरोजगार कहा जाता है? मूल रूप से बेरोजगार ऐसा व्यक्ति होता है जो काम करने के लिए तैयार है और एक रोजगार के अवसर की तलाश कर रहा है पर रोजगार प्राप्त करने में असमर्थ है। जो लोग स्वेच्छा से बेरोजगार रहते हैं या कुछ शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण काम करने में असमर्थ होते हैं वे बेरोजगार नहीं गिने जाते हैं।

यहां बेरोजगारी के विभिन्न प्रकारों पर एक विस्तृत नज़र डाली गई है:

प्रच्छन्न बेरोजगारी

जब ज़रूरी संख्या से ज्यादा लोगों को एक जगह पर नौकरी दी जाती है तो इसे प्रच्छन्न बेरोजगारी कहा जाता है। इन लोगों को हटाने से उत्पादकता प्रभावित नहीं होती है।

मौसमी बेरोजगारी

जैसा कि शब्द से ही स्पष्ट है यह उस तरह की बेरोजगारी का प्रकार है जिसमें वर्ष के कुछ समय में ही काम मिलता है। मुख्य रूप से मौसमी बेरोजगारी से प्रभावित उद्योगों में कृषि उद्योग, रिसॉर्ट्स और बर्फ कारखानें आदि शामिल हैं।

खुली बेरोजगारी

खुली बेरोजगारी से तात्पर्य है कि जब एक बड़ी संख्या में मजदूर नौकरी पाने में असमर्थ होते हैं जो उन्हें नियमित आय प्रदान कर सके। यह समस्या तब होती है क्योंकि श्रम बल अर्थव्यवस्था की विकास दर की तुलना में बहुत अधिक दर से बढ़ जाती है।

तकनीकी बेरोजगारी

तकनीकी उपकरणों के इस्तेमाल से मानवी श्रम की आवश्यकता कम होने से भी बेरोजगारी बढ़ी है।

संरचनात्मक बेरोजगारी

इस प्रकार की बेरोज़गारी देश की आर्थिक संरचना में एक बड़ा बदलाव की वजह से होती है। यह तकनीकी उन्नति और आर्थिक विकास का नतीजा है।

चक्रीय बेरोजगारी

व्यावसायिक गतिविधियों के समग्र स्तर में कमी से चक्रीय बेरोज़गारी होती है। हालांकि यह घटना थोड़े समय के ही लिए है।

शिक्षित बेरोजगारी

उपयुक्त नौकरी खोजने में असमर्थता, रोजगार योग्य कौशल की कमी और दोषपूर्ण शिक्षा प्रणाली जैसे कुछ कारण हैं जिससे शिक्षित बेरोजगार रहता है।

ठेका बेरोज़गारी

इस तरह के बेरोजगारी में लोग या तो अंशकालिक आधार पर नौकरी करते हैं या उस तरह के काम करते हैं जिसके लिए वे अधिक योग्य हैं।

प्रतिरोधात्मक बेरोजगारी

यह तब होता है जब श्रम बल की मांग और इसकी आपूर्ति उचित रूप से समन्वयित नहीं होती है।

दीर्घकालिक बेरोजगारी

दीर्घकालिक बेरोजगारी वह होती है जो जनसंख्या में तेजी से वृद्धि और आर्थिक विकास के निम्न स्तर के कारण देश में जारी है।

आकस्मिक बेरोजगारी

मांग में अचानक गिरावट, अल्पकालिक अनुबंध या कच्चे माल की कमी के कारण ऐसी बेरोजगारी होती है।

निष्कर्ष

हालांकि सरकार ने हर तरह की बेरोजगारी को नियंत्रित करने के लिए कई कार्यक्रम शुरू किए हैं परन्तु अभी तक परिणाम संतोषजनक नहीं मिले हैं। सरकार को रोजगार सृजन करने के लिए और अधिक प्रभावी रणनीति तैयार करने की जरूरत है।

बेरोजगारी पर निबंध 4 (500 शब्द)

बेरोजगारी एक गंभीर समस्या है। शिक्षा की कमी, रोजगार के अवसरों की कमी, कौशल की कमी, प्रदर्शन संबंधी मुद्दे और बढ़ती आबादी सहित कई कारक भारत में इस समस्या को बढ़ाने में अपना योगदान देते हैं। व्यग्तिगत प्रभावों के साथ-साथ पूरे समाज पर इस समस्या के नकारात्मक नतीजे देखे जा सकते हैं। सरकार ने इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए कई तरह कदम उठाये हैं। इनमें से कुछ का उल्लेख विस्तार से इस प्रकार है।

बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकारी पहल

  1. स्वयं रोजगार के लिए प्रशिक्षण

1979 में शुरू किए गये इस कार्यक्रम का नाम नेशनल स्कीम ऑफ़ ट्रेनिंग ऑफ़ रूरल यूथ फॉर सेल्फ एम्प्लॉयमेंट (TRYSEM) था। इसका उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में युवाओं के बीच बेरोजगारी को कम करना है।

  1. इंटीग्रेटेड रूरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IRDP)

वर्ष 1 978-79  में ग्रामीण क्षेत्रों में पूर्ण रोजगार के अवसर सुनिश्चित करने के लिए भारत सरकार ने इंटीग्रेटेड रूरल डेवलपमेंट प्रोग्राम शुरू किया। इस कार्यक्रम पर 312 करोड़ रुपए खर्च किए गए थे और 182 लाख परिवारों को इससे लाभ हुआ था।

  1. विदेशी देशों में रोजगार

सरकार विदेशी कंपनियों में रोजगार पाने में लोगों की मदद करती है। अन्य देशों में लोगों के लिए काम पर रखने के लिए विशेष एजेंसियां ​​स्थापित की गई हैं।

  1. लघु और कुटीर उद्योग

बेरोजगारी के मुद्दे को कम करने के प्रयास में सरकार ने छोटे और कुटीर उद्योग भी विकसित किए हैं। कई लोग इस पहल के साथ अपनी जीविका अर्जित कर रहे हैं।

  1. स्वर्ण जयंती रोजगार योजना

इस कार्यक्रम का उद्देश्य शहरी आबादी के लिए स्वयंरोजगार और मजदूरी-रोजगार के अवसर प्रदान करना है। इसमें दो योजनाएं शामिल हैं:

  • शहरी स्वयं रोजगार कार्यक्रम
  • शहरी मजदूरी रोजगार कार्यक्रम
  1. रोजगार आश्वासन योजना

यह कार्यक्रम देश में 1752 पिछड़े वर्गों के लिए 1994 में शुरू किया गया था। ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले गरीब बेरोजगार लोगों को इस योजना के तहत 100 दिनों तक अकुशल मैनुअल काम प्रदान किया गया था।

  1. सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP)

यह कार्यक्रम 13 राज्यों में शुरू किया गया और मौसमी बेरोजगारी को दूर करने के उद्देश्य से 70 सूखा-प्रवण जिलों को कवर किया गया। अपनी सातवीं योजना में सरकार ने 474 करोड़ रुपये खर्च किए।

  1. जवाहर रोजगार योजना

अप्रैल 1989 में शुरू किए गये इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्रत्येक गरीब ग्रामीण परिवार में कम से कम एक सदस्य को एक वर्ष तक पचास से सौ दिन रोजगार प्रदान करना था। व्यक्ति के आसपास के क्षेत्र में रोजगार का अवसर प्रदान किया जाता है और इन अवसरों का 30% महिलाओं के लिए आरक्षित है।

  1. नेहरू रोज़गार योजना (NRY)

इस कार्यक्रम के तहत कुल तीन योजनाएं हैं। पहली योजना के अंतर्गत शहरी गरीबों को सूक्ष्म उद्यमों को स्थापित करने के लिए सब्सिडी दी जाती है। दूसरी योजना के अंतर्गत 10 लाख से कम की आबादी वाले शहरों में मजदूरों के लिए मजदूरी-रोजगार की व्यवस्था की जाती है। तीसरी योजना के तहत शहरों में शहरी गरीबों को अपने कौशल से मेल खाते रोजगार के अवसर दिए जाते हैं।

  1. रोजगार गारंटी योजना

बेरोजगार लोगों को इस योजना के तहत आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इसे केरल, महाराष्ट्र, राजस्थान आदि सहित कई राज्यों में शुरू किया गया है।

इसके अलावा बेरोजगारी को कम करने के लिए कई अन्य कार्यक्रम सरकार द्वारा शुरू किए गए हैं।

निष्कर्ष

हालांकि सरकार देश में बेरोजगारी की समस्या को नियंत्रित करने के लिए कई उपाय कर रही है पर इस समस्या को सही मायनों में रोकने के लिए अभी भी बहुत कुछ करने की आवश्यकता है।


 

बेरोजगारी पर निबंध 5 (600 शब्द)

बेरोजगारी एक गंभीर मुद्दा है। कई कारक हैं जो इसके लिए जिम्मेदार हैं। इनमें से कुछ में उचित शिक्षा की कमी, अच्छे कौशल और हुनर की कमी, प्रदर्शन करने में असमर्थता, अच्छे रोजगार के अवसरों की कमी और तेजी से बढ़ती आबादी शामिल है। आगे देश में बेरोजगारी स्थिरता, बेरोजगारी के परिणाम और सरकार द्वारा इसे नियंत्रित करने के लिए किए गए उपायों पर एक नज़र डाली गई है।

भारत में बेरोजगारी से संबंधित आकंडे

भारत में श्रम और रोजगार मंत्रालय देश में बेरोजगारी के रिकॉर्ड रखता है। बेरोजगारी के आंकड़ों की गणना उन लोगों की संख्या के आधार पर की जाती है जिनके आंकड़ों के मिलान की तारीख से पहले 365 दिनों के दौरान पर्याप्त समय के लिए कोई काम नहीं था और अभी भी रोजगार की मांग कर रहे हैं।

वर्ष 1983 से 2013 तक भारत में बेरोजगारी की दर औसत 7.32 प्रतिशत के साथ सबसे अधिक 9.40% थी और 2013 में यह रिकॉर्ड 4.90% थी। वर्ष 2015-16 में बेरोजगारी की दर महिलाओं के लिए 8.7% हुई और पुरुषों के लिए 4.3 प्रतिशत हुई।

बेरोजगारी के परिणाम

बेरोजगारी की वजह से गंभीर सामाजिक-आर्थिक मुद्दे होते है। इससे न केवल एक व्यक्ति बल्कि पूरा समाज प्रभावित होता है। नीचे बेरोजगारी के कुछ प्रमुख परिणामों की व्याख्या की गई हैं:

यह कथन बिल्कुल सत्य है कि बेरोजगारी दर में वृद्धि से देश में गरीबी की दर में वृद्धि हुई है। देश के आर्थिक विकास को बाधित करने के लिए बेरोजगारी मुख्यतः जिम्मेदार है।

एक उपयुक्त नौकरी खोजने में असमर्थ बेरोजगार आमतौर पर अपराध का रास्ता लेता है क्योंकि यह पैसा बनाने का एक आसान तरीका है। चोरी, डकैती और अन्य भयंकर अपराधों के तेजी से बढ़ते मामलों के मुख्य कारणों में से एक बेरोजगारी है।

कर्मचारी आम तौर पर कम वेतन की पेशकश कर बाजार में नौकरियों की कमी का लाभ उठाते हैं। अपने कौशल से जुड़ी नौकरी खोजने में असमर्थ लोग आमतौर पर कम वेतन वाले नौकरी के लिए व्यवस्थित होते हैं। कर्मचारियों को प्रत्येक दिन निर्धारित संख्या के घंटे के लिए भी काम करने के लिए मजबूर किया जाता है।

रोजगार के अवसरों की कमी के परिणामस्वरूप सरकार में विश्वास की कमी होती है और यह स्थिति अक्सर राजनीतिक अस्थिरता की ओर जाती है।

बेरोजगार लोगों में असंतोष का स्तर बढ़ता है जिससे यह धीरे-धीरे चिंता, अवसाद और अन्य मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं में बदलने लगती है।

लंबे समय के लिए नौकरी से बाहर रहने से जिंदगी नीरस और कौशल का नुकसान होता है। यह एक व्यक्ति के आत्मविश्वास काफी हद तक कम कर देता है।

बेरोजगारी को कम करने के लिए सरकारी पहल

भारत सरकार ने बेरोजगारी की समस्या को कम करने के साथ-साथ देश में बेरोजगारों की मदद के लिए कई तरह के कार्यक्रम शुरू किए है। इनमें से कुछ में इंटीग्रेटेड रूरल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IRDP), जवाहर रोज़गार योजना, सूखा प्रवण क्षेत्र कार्यक्रम (DPAP), स्व-रोजगार के लिए प्रशिक्षण, नेहरू रोज़गार योजना (NRY), रोजगार आश्वासन योजना, प्रधान मंत्री की समन्वित शहरी गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम (PMIUPEP), रोजगार कार्यालयों, विदेशी देशों में रोजगार, लघु और कुटीर उद्योग, रोजगार गारंटी योजना और जवाहर ग्राम समृद्धि योजना का विकास आदि शामिल हैं।

इन कार्यक्रमों के जरिए रोजगार के अवसर प्रदान करने के अलावा सरकार शिक्षा के महत्व को भी संवेदित कर रही है और बेरोजगार लोगों को कौशल प्रशिक्षण प्रदान कर रही है।

निष्कर्ष

बेरोजगारी समाज में विभिन्न समस्याओं का मूल कारण है। हालांकि सरकार ने इस समस्या को कम करने के लिए पहल की है लेकिन उठाये गये उपाय पर्याप्त प्रभावी नहीं हैं। इस समस्या के कारण विभिन्न कारकों को प्रभावी और एकीकृत समाधान देखने के लिए अच्छी तरह से अध्ययन किया जाना चाहिए। यह समय है कि सरकार को इस मामले की संवेदनशीलता को पहचानना चाहिए और इसे कम करने के लिए कुछ गंभीर कदम उठाने चाहिए।


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