Hindi Essay On Moon

पृथ्वी के उत्तरी गोलार्द्ध से देखा गया पूर्ण चंद्र

उपनाम

विशेषणलूनर, सेलेनिक

कक्षीय विशेषताएँ

पेरिएप्सिस363,295 किमी
(0.0024 एयू)
एपोऐप्सिस405,503 किमी
(0.0027 एयू)
अर्ध मुख्य अक्ष384,399
(0.00257 AU)[1]
विकेन्द्रता0.0549[1]
परिक्रमण काल27.321582 d(27 d 7 h 43.1 min[1])
संयुति काल29.530589 d(29 d 12 h 44 min 2.9 s)
औसत परिक्रमण गति1.022 किमी/सेकंड
झुकाव5.145° क्रांतिवृत्त से[2] (पृथ्वी की भूमध्यरेखा से 18.29° और 28.58° के बीच)[1]
आरोह  पात का अनुलम्बregressing by one revolution in 18.6 years
Argument of perigeeprogressing by one revolution in 8.85 years
स्वामी ग्रहपृथ्वी

भौतिक विशेषताएँ

माध्य त्रिज्या1,737.10 km (0.273 Earths)[1][3]
विषुवतीय त्रिज्या1,738.14 km (0.273 Earths)[3]
ध्रुवीय त्रिज्या1,735.97 km (0.273 Earths)[3]
सपाटता0.00125
परिधि10,921 km (equatorial)
तल-क्षेत्रफल3.793 km2 (0.074 Earths)
आयतन2.1958 km3 (0.020 Earths)
द्रव्यमान7.3477 kg (0.012300 Earths[1])
माध्य घनत्व3.3464 g/cm3[1]
विषुवतीय सतह गुरुत्वाकर्षण1.622 m/s2(0.165 4 g)
पलायन वेग2.38 km/s
नाक्षत्र घूर्णन
काल
27.321582 d (समकालिक)
विषुवतीय घूर्णन वेग4.627 m/s
अक्षीय नमन1.5424° (क्रांतिवृत्त से)
6.687° (कक्षीय तल)[2]
अल्बेडो0.136[4]
सतह का तापमान
   equator
   85°N[6]
न्यूनमाध्यअधि
100 के220 के390 के
70 के130 के230 के
स्पष्ट परिमाण−2.5 to −12.9 [5]
−12.74 (माध्य पूर्ण चंद्र)
कोणीय व्यास29.3 से 34.1 आर्क मीनट

वायु-मंडल[7]

सतह पर दाब10−7Pa (दिन)
10−10 Pa (रात)
संघटनAr, He, Na, K, H, Rn

चन्द्रमापृथ्वी का एकमात्र प्राकृतिक उपग्रह है।[8] यह सौर मंडल का पाचवाँ,सबसे विशाल प्राकृतिक उपग्रह है। पृथ्वी के मध्य से चन्द्रमा के मध्य तक कि दूरी ३८४,४०३ किलोमीटर है। यह दूरी पृथ्वी कि परिधि के ३० गुना है। चन्द्रमा पर गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से १/६ है। यह प्रथ्वी कि परिक्रमा २७.३ दिन में पूरा करता है और अपने अक्ष के चारो ओर एक पूरा चक्कर भी २७.३ दिन में लगाता है। यही कारण है कि चन्द्रमा का एक ही हिस्सा या फेस हमेशा पृथ्वी की ओर होता है। यदि चन्द्रमा पर खड़े होकर पृथ्वी को देखे तो पृथ्वी साफ़ साफ़ अपने अक्ष पर घूर्णन करती हुई नजर आएगी लेकिन आसमान में उसकी स्थिति सदा स्थिर बनी रहेगी अर्थात पृथ्वी को कई वर्षो तक निहारते रहो वह अपनी जगह से टस से मस नहीं होगी। पृथ्वी- चन्द्रमा-सूर्य ज्यामिति के कारण "चन्द्र दशा" हर २९.५ दिनों में बदलती है। आकार के हिसाब से अपने स्वामी ग्रह के सापेक्ष यह सौरमंडल में सबसे बड़ा प्राकृतिक उपग्रह है जिसका व्यास पृथ्वी का एक चौथाई तथा द्रव्यमान १/८१ है। बृहस्पति के उपग्रह lo के बाद चन्द्रमा दूसरा सबसे अधिक घनत्व वाला उपग्रह है। सूर्य के बाद आसमान में सबसे अधिक चमकदार निकाय चन्द्रमा है। समुद्री ज्वार और भाटा चन्द्रमा की गुरुत्वाकर्षण शक्ति के कारण आते हैं। चन्द्रमा की तात्कालिक कक्षीय दूरी, पृथ्वी के व्यास का ३० गुना है इसीलिए आसमान में सूर्य और चन्द्रमा का आकार हमेशा सामान नजर आता है। वह पथ्वी से चंद्रमा का 59 % भाग दिखता है जब चन्द्रमा अपनी कक्षा में घूमता हुआ सूर्य और पृथ्वी के बीच से होकर गुजरता है और सूर्य को पूरी तरह ढक लेता है तो उसे सूर्यग्रहण कहते हैं।

अन्तरिक्ष में मानव सिर्फ चन्द्रमा पर ही कदम रख सका है। सोवियत राष्ट् का लूना-१ पहला अन्तरिक्ष यान था जो चन्द्रमा के पास से गुजरा था लेकिन लूना-२ पहला यान था जो चन्द्रमा की धरती पर उतरा था। सन् १९६८ में केवल नासा अपोलो कार्यक्रम ने उस समय मानव मिशन भेजने की उपलब्धि हासिल की थी और पहली मानवयुक्त ' चंद्र परिक्रमा मिशन ' की शुरुआत अपोलो -८ के साथ की गई। सन् १९६९ से १९७२ के बीच छह मानवयुक्त यान ने चन्द्रमा की धरती पर कदम रखा जिसमे से अपोलो-११ ने सबसे पहले कदम रखा। इन मिशनों ने वापसी के दौरान ३८० कि. ग्रा. से ज्यादा चंद्र चट्टानों को साथ लेकर लौटे जिसका इस्तेमाल चंद्रमा की उत्पत्ति, उसकी आंतरिक संरचना के गठन और उसके बाद के इतिहास की विस्तृत भूवैज्ञानिक समझ विकसित करने के लिए किया गया। ऐसा माना जाता है कि करीब ४.५ अरब वर्ष पहले पृथ्वी के साथ विशाल टक्कर की घटना ने इसका गठन किया है।

सन् १९७२ में अपोलो-१७ मिशन के बाद से चंद्रमा का दौरा केवल मानवरहित अंतरिक्ष यान के द्वारा ही किया गया जिसमें से विशेषकर अंतिम सोवियत लुनोखोद रोवर द्वारा किया गया है। सन् २००४ के बाद से जापान, चीन, भारत, संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी में से प्रत्येक ने चंद्र परिक्रमा के लिए यान भेजा है। इन अंतरिक्ष अभियानों ने चंद्रमा पर जल-बर्फ की खोज की पुष्टि के लिए विशिष्ठ योगदान दिया है। चंद्रमा के लिए भविष्य की मानवयुक्त मिशन योजना सरकार के साथ साथ निजी वित्त पोषित प्रयासों से बनाई गई है। चंद्रमा ' बाह्य अंतरिक्ष संधि ' के तहत रहता है जिससे यह शांतिपूर्ण उद्देश्यों की खोज के लिए सभी राष्ट्रों के लिए मुक्त है।

चन्द्रयान (अथवा चंद्रयान-१) भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के चंद्र अन्वेषण कार्यक्रम के अंतर्गत द्वारा चंद्रमा की तरफ कूच करने वाला भारत का पहला[9] अंतरिक्ष यान था।

भौतिकीय गुण[संपादित करें]

नाम और व्युत्पत्ति[संपादित करें]

आतंरिक संरचना[संपादित करें]

चंद्रमा एक विभेदित निकाय है जिसका भूरसायानिक रूप से तीन भाग क्रष्ट, मेंटल और कोर है। चंद्रमा का २४० किलोमीटर त्रिज्या का लोहे की बहुलता युक्त एक ठोस भीतरी कोर है और इस भीतरी कोर का बाहरी भाग मुख्य रूप से लगभग ३०० किलोमीटर की त्रिज्या के साथ तरल लोहे से बना हुआ है। कोर के चारों ओर ५०० किलोमीटर की त्रिज्या के साथ एक आंशिक रूप से पिघली हुई सीमा परत है।

संघात खड्ड[संपादित करें]

संघात खड्ड निर्माण प्रक्रिया एक अन्य प्रमुख भूगर्भिक प्रक्रिया है जिसने चंद्रमा की सतह को प्रभावित किया है, इन खड्डों का निर्माण क्षुद्रग्रहों और धूमकेतुओं के चंद्रमा की सतह से टकराने के साथ हुआ है। चंद्रमा के अकेले नजदीकी पक्ष में ही १ किमी से ज्यादा चौड़ाई के लगभग ३,००,००० खड्डों के होने का अनुमान है। [10] इनमें से कुछ के नाम विद्वानों, वैज्ञानिकों, कलाकारों और खोजकर्ताओँ पर हैं। [11] चंद्र भूगर्भिक कालक्रम सबसे प्रमुख संघात घटनाओं पर आधारित है, जिसमें नेक्टारिस, इम्ब्रियम और ओरियेंटेल शामिल है, एकाधिक उभरी सतह के छल्लों द्वारा घिरा होना इन संरचनाओं की ख़ास विशेषता है।

पानी की उपस्थिति[संपादित करें]

२००८ में चंद्रयान अंतरिक्ष यान ने चन्द्रमा पर सतह जल बर्फ के अस्तित्व की पुष्टि की है।

चुम्बकीय क्षेत्र[संपादित करें]

चंद्रमा का करीब 1-100 नैनोटेस्ला का एक बाह्य चुम्बकीय क्षेत्र है। पृथ्वी की तुलना में यह सौवें भाग से भी कम है।

चंद्रमा की उत्पत्ति[संपादित करें]

चंद्रमा की उत्पत्ति आमतौर पर माने जाते हैं कि एक मंगल ग्रह के शरीर ने धरती पर मारा, एक मलबे की अंगूठी बनाकर अंततः एक प्राकृतिक उपग्रह, चंद्रमा में एकत्र किया, लेकिन इस विशाल प्रभाव परिकल्पना पर कई भिन्नताएं हैं, साथ ही साथ वैकल्पिक स्पष्टीकरण और शोध में चंद्रमा कैसे जारी हुआ। [1] [2] अन्य प्रस्तावित परिस्थितियों में कब्जा निकाय, विखंडन, एक साथ एकत्रित (संक्षेपण सिद्धांत), ग्रहों संबंधी टकराव (क्षुद्रग्रह जैसे शरीर से बने), और टकराव सिद्धांत शामिल हैं। [3]

मानक विशाल-प्रभाव परिकल्पना मंगल ग्रह के आकार के शरीर को बताती है, थिआ कहलाता है, पृथ्वी पर असर पड़ता है, जिससे पृथ्वी के चारों ओर एक बड़ी मलबे की अंगूठी पैदा होती है, जिसके बाद चंद्रमा के रूप में प्रवेश किया जाता है। इस टकराव के कारण पृथ्वी के 23.5 डिग्री झुका हुआ धुरी भी उत्पन्न हुई, जिससे मौसम उत्पन्न हो गया। [1] चंद्रमा के ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात पृथ्वी के लिए अनिवार्य रूप से समान दिखते हैं। [4] ऑक्सीजन समस्थानिक अनुपात, जिसे बहुत ठीक मापा जा सकता है, प्रत्येक सौर मंडल निकाय के लिए एक अद्वितीय और विशिष्ट हस्ताक्षर उत्पन्न करता है। [5] अगर थिया एक अलग प्रोटॉपलैनेट था, तो शायद पृथ्वी से एक अलग ऑक्सीजन आइसोटोप हस्ताक्षर होता, जैसा कि अलग-अलग मिश्रित पदार्थ होता। [6] इसके अलावा, चंद्रमा के टाइटेनियम आइसोटोप अनुपात (50Ti / 47Ti) पृथ्वी के करीब (4 पीपीएम के भीतर) प्रतीत होता है, यदि कम से कम किसी भी टकराने वाला शरीर का द्रव्यमान चंद्रमा का हिस्सा हो सकता है। [7]

मुख्य लेख : चंद्रमा की उत्पत्ति

सन्दर्भ[संपादित करें]

  1. वेइज़ोरेक, मार्क ए. (2006). "The constitution and structure of the lunar interior". w:Reviews in Mineralogy and Geochemistry60 (1): 221–364. Bibcode2006RvMG...60..221W. doi:10.2138/rmg.2006.60.3. 
  2. लॅन्ग, कॅन्नेथ आर. (२०११), द कॅम्ब्रिज गाइड टू द सोलर सिस्टमArchived १ जनवरी २०१६, at the Wayback Machine., द्वितीय संस्करण, कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी प्रेस
  3. विलियम्स, डॉ.डेविड आर। (२ फ़रवरी २००६). "मून फ़ॅक्ट शीट". नासा/नेशनल स्पेस साइंस डाटा सेण्टर. Archived from the original on २३ मार्च २०१०. http://nssdc.gsfc.nasa.gov/planetary/factsheet/moonfact.html. अभिगमन तिथि: ३१ दिसम्बर २००९. 
  4. ↑मॅथ्यूज़, ग्राण्ट (2008). "Celestial body irradiance determination from an underfilled satellite radiometer: application to albedo and thermal emission measurements of the Moon using CERES". Applied Optics47 (27): 4981–93. Bibcode2008ApOpt..47.4981M. doi:10.1364/AO.47.004981. PMID 18806861. 
  5. ↑The maximum value is given based on scaling of the brightness from the value of −12.74 given for an equator to Moon-centre distance of 378 000 km in the NASA factsheet reference to the minimum Earth–Moon distance given there, after the latter is corrected for Earth's equatorial radius of 6 378 km, giving 350 600 km. The minimum value (for a distant new moon) is based on a similar scaling using the maximum Earth–Moon distance of 407 000 km (given in the factsheet) and by calculating the brightness of the earthshine onto such a new moon. The brightness of the earthshine is [ Earth albedo ×(Earth radius / Radius of Moon's orbit)2 ] relative to the direct solar illumination that occurs for a full moon. (Earth albedo = 0.367; Earth radius = (polar radius × equatorial radius)½ = 6 367 km.)
  6. ↑ए आर वासवाडा; डी ए पेइज; एस ई वुड (1999). "Near-Surface Temperatures on Mercury and the Moon and the Stability of Polar Ice Deposits". Icarus141 (2): 179–193. Bibcode1999Icar..141..179V. doi:10.1006/icar.1999.6175. 
  7. ↑Lucey, Paul; Korotev, Randy L. एवम् अन्य (2006). "Understanding the lunar surface and space-Moon interactions". Reviews in Mineralogy and Geochemistry60 (1): 83–219. Bibcode2006RvMG...60...83L. doi:10.2138/rmg.2006.60.2. 
  8. ↑"चंद्रमा का जन्म कैसे हुआ था?". http://www.bbc.com/hindi/science/2014/06/140606_moon_theia_collusion_ssr. 
  9. ↑"चंद्रयान-1" (hi में). 4 October 2017. https://www.isro.gov.in/hi/Spacecraft/%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%A8-1. अभिगमन तिथि: 14 December 2017. 
  10. ↑मून फेक्ट स्मार्ट-१, यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी २०१०, १२ मई २०१० को लिया गया |
  11. ↑गेजेटरी ऑफ़ प्लेनेटरी नोमेनक्लेचर : केटेगरी फॉर नेमिंग फीचर्स ऑन प्लेनेट्स एंड सेटेलाइट्स अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, 8 अप्रैल 2010 को लिया गया |

बाहरी कड़ियाँ[संपादित करें]

चन्द्रमा की आतंरिक संरचना

चन्द्रमा

पृथ्वी की ओर वाली चन्द्रमा की सतह

पृथ्वी के विरुद्ध (अदृश्य) वाली चन्द्रमा की सतह

चंद्रमा का उत्तरी ध्रुव

चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव

नील अल्डेन आर्मस्ट्रॉन्ग – Neil Armstrong एक अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री और चाँद पर जाने वाले पहले इंसान थे। वे एक एरोस्पेस इंजीनयर, नौसेना विमान चालक, टेस्ट पायलट और यूनिवर्सिटी प्रोफेसर थे। अंतरिक्ष यात्री बनने से पहले आर्मस्ट्रॉन्ग यूनाइटेड स्टेट के नेवी ऑफिसर और कोरियाई युद्ध में सेवारत थे।

चाँद का पहला यात्री – आर्मस्ट्रॉन्ग | Neil Armstrong On The Moon

युद्ध के बाद पुरदुरे यूनिवर्सिटी से उन्हें बैचलर की उपाधि प्राप्त की और हाई स्पीड फ्लाइट स्टेशन नेशनल एडवाइजरी कमिटी फॉर एरोनॉटिक्स (NACA) में टेस्ट पायलट के पद पर सेवारत सेवा की । वहाँ उन्होंने तकरीबन 900 फ्लाइट टेस्ट की। बाद में यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथर्न कैलिफ़ोर्निया से उन्होंने ग्रेजुएशन पूरा किया।

वे यूनाइटेड स्टेट एयर फ़ोर्स मैन (Man) स्पेस सूनेस्ट और X-20 Dyne-Soar ह्यूमन स्पेसफ्लाइट प्रोग्राम के सदस्य भी थे। 1962 में आर्मस्ट्रॉन्ग नासा के एस्ट्रोनॉट कॉर्प्स में शामिल हुए थे। 8 मार्च 1966 को कमांड पायलट के रूप में उन्होंने अपनी पहली स्पेस फ्लाइट उड़ाई थी। उस समय वे नासा के पहले अंतरिक्ष यात्री बने थे। पहली बार उन्होंने पायलट डेविड स्कॉट के साथ उड़ान भरी थी। लेकिन उनकी यह उड़ान बाद में रद्द कर दी थी।
आर्मस्ट्रांग की दूसरी और अंतिम स्पेसफ्लाइट कमांडर के रूप में अपोलो 11 थी, पहली फ्लाइट जुलाई 1969 को चाँद पर उतरी थी। आर्मस्ट्रांग और चन्द्रमा मोड्यूल पायलट बज्ज एल्ड्रिन चन्द्रमा की सतह पर अवतरित हुए थे और उन्होंने पुरे 2.30 घंटे स्पेस क्राफ्ट के बाहर बिताये थे, जबकि माइकल कॉलिंस चन्द्रमा ऑर्बिट में ही सर्विस मोड्यूल में थे। कॉलिंस और एल्ड्रिन के साथ आर्मस्ट्रांग को प्रेसिडेंट रिचर्ड निक्सन ने प्रेसिडेंशल मेडल ऑफ़ फ्रीडम अवार्ड से सम्मानित भी किया गया था। प्रेसिडेंट जिमी कार्टर ने 1978 में आर्मस्ट्रांग को कांग्रेशनल स्पेस मेडल ऑफ़ हॉनर से सम्मानित भी किया था। आर्मस्ट्रांग और उनके पुराने सहकर्मियों को भी 2009 में कांग्रेशनल गोल्ड मेडल से सम्मानित किया गया था।
कोरोनरी बाईपास सर्जरी करवाने के बाद 82 साल की उम्र में 25 अगस्त 2012 को उनकी मृत्यु हो गयी थी।

प्रारंभिक जीवन –

नील आर्मस्ट्रांग – Neil Armstrong का जन्म 5 अगस्त 1930 को औग्लैज़ देश में ऑहियो के वापकोनेता में हुआ था। उनके पिता का नाम स्टेफेन कोएँग़ आर्मस्ट्रांग और माता का नाम वाइला लौईस एंगेल था। वे एक स्कॉटिश, आयरिश और जर्मन वंशज थे और उनके दो छोटे भाई जून और डीन भी है। ऑहियो राज्य सरकार के लिए उन्हें ऑडिटर का काम भी किया है। आर्मस्ट्रांग का जन्म होने के बाद उनका परिवार बार-बार उसी राज्य में घर बदलता रहा। बचपन से ही नील में उडान भरने की रूचि थी, वे बहोत सी एयर रेस में भी भाग लेते थे। जब वे सिर्फ पाँच साल के थे तभी उन्होंने 20 जुलाई 1936 को फोर्ड त्रिमोटर में पहली एयरप्लेन फ्लाइट का अनुभव लिया था।

अंतिम बार उनका परिवार 1944 में बसा था, उस समय उनका परिवार नील के जन्मस्थान वापकोनेता में रहने लगा था। फ्लाइंग का अभ्यास करने के लिए आर्मस्ट्रांग ग्रास्सी वापकोनेता एयरफील्ड में ब्लुमे हाई स्कूल जाते थे। अपने 16 वे जन्मदिन पर उन्हें पहला स्टूडेंट फ्लाइट सर्टिफिकेट भी मिला था। इसके बाद उन्हें ड्राइविंग लाइसेंस भी मिला। आर्मस्ट्रांग एक सक्रीय विद्यार्थी थे और उन्हें ईगल स्काउट की पदवी भी दी गयी थी। किशोरावस्था में ही उन्होंने बहोत से ईगल स्काउट अवार्ड अर्जित किये और साथ ही उन्हें सिल्वर बफैलो अवार्ड भी मिला था। 18 जून 1969 को चन्द्रमा की यात्रा करते समय कोलंबिया में आर्मस्ट्रांग ने स्काउट को कहा था की, “मै अपने सभी सहकर्मी स्काउट को हेल्लो कहना चाहता हु और यात्रा के लिए सभी का अभिनंदन करना चाहता हु, अपोलो 11 निश्चित ही हमारी इच्छाओ पर खरा उतरेगा।”

1947 में 17 साल की आयु में आर्मस्ट्रांग ने एयरोनॉटिकल इंजिनियर की पढाई पुर्दुर यूनिवर्सिटी से ग्रहण करना शुरू की। कॉलेज जाने वाले वे उनके परिवार के दुसरे इंसान थे। पढने के लिए उन्होंने मेसाचुसेट्स इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (MIT) को भी अपना लिया था। आर्मस्ट्रांग का मानना था की हम कही भी पढ़कर अच्छे से अच्छी शिक्षा हासिल कर सकते है।

होलीवे (Hollyway) प्लान के तहत ही उनकी ट्यूशन फीस दी जाती थी। वहा उन्होंने तक़रीबन 2 साल पढाई कि और दो सालो तक फ्लाइट ट्रेनिंग भी ली और एक साल तक US नेवी में कार्यरत रहे और वही से उन्होंने बैचलर की डिग्री भी हासिल की। वहा कैंडिडेट को लिखकर देना होता था की ग्रेजुएशन होने तक वह शादी नही करेगा ताकि कैंडिडेट अच्छी तरह से अपने काम में ध्यान लगा सके और तक़रीबन दो साल तक उन्हें वहा कोई प्रमोशन भी नही दिया जाता था।

चन्द्रमा पर लैंडिंग (Neil Armstrong Moon Landing)

1969 में आर्मस्ट्रांग को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। माइकल कॉलिंस और एडविन इ. बज्ज एल्ड्रिन के साथ वे नासा के पहले चन्द्र मिशन का हिस्सा बने हुए थे। 16 जुलाई 1969 को उनकी तिकड़ी अंतरिक्ष पहुची। मिशन कमांडर आर्मस्ट्रांग ने 20 जुलाई 1969 को चन्द्रमा की सतह पर लैंडिंग की थी। लेकिन उनके सहकर्मी कॉलिंस कमांड मोड्यूल में ही बैठे थे।

10.56 PM को आर्मस्ट्रांग चन्द्रमा मोड्यूल से बाहर निकले थे। उन्होंने कहा था, “इंसान का यह छोटा सा कदम, मानवी जाती के लिए एक बहुत बड़ी छलांग है।” उन्होंने ही चद्रमा पर अपना पहला कदम रखा था। तक़रीबन 2.30 घंटे तक नील और एल्ड्रिन ने चन्द्रमा के कुछ सैंपल (Sample) जमा किया और उनपर प्रयोग भी किया। उन्होंने बहुत से फोटो भी निकाले जिनमे उनके खुद के पदचिन्हों का फोटो भी शामिल है।
24 जुलाई 1969 को अपोलो 11 से वे वापिस आये थे और हवाई के पेसिफिक वेस्ट ओसियन पर उन्होंने लैंडिंग की थी। इसके बाद तीन हफ्तों तक तीन अंतरिक्ष यात्रियों को संगरोध पर भेजा गया था।

धरती पर वापिस लौटने के बाद तीनो अंतरीक्ष यात्रियों की काफी तारीफ की गयी थी और उनका स्वागत भी किया गया था। उनके सम्मान में न्यू यॉर्क शहर में एक परेड भी रखी गयी थी। अपने अतुलनीय कार्यो के लिए आर्मस्ट्रांग को बहुत से प्रशंसनीय अवार्ड मिले है जिसमे कांग्रेशनल स्पेस मेडल भी शामिल है।

यह भी पढ़े :

  1. सुनीता विलियम की जीवनी
  2. अंतरिक्ष यात्री राकेश शर्मा

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Gyani Pandit

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